Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebook"गीत, गीत, जब देखो गीत, आखिर कभी तो आदमी दूसरे का दिल रखने का यत्न करें."
ये थे वो शब्द जो चाँदरानी ने अपने पती की बेपरर्वाही से तंग आकर ताराचंद से कहे; और क्यों न कहती वह एक औरत थी. उसके सीने में औरत का दिल था। वह चाहती थी के उसका पति केवल उससे प्रेम हीन करे बल्कि रात दिन उसकी चाहत का दिवाना बना रहे। मगर सूरजनाथ अपनी इस कमजोरी को क्योंकर समझता, इसलिये के वह शाईर था और शाईयर होते भी हैं बेपर्वा. जबकि उन्हें अपने आपकी सुध नहीं रहती तो वह दूसरों का कब ख़्याल करेंगे, मगर इसका ये मतलब नहीं कि सूरजनाथ को चाँदरानी से प्रेम ही नहीं था. वह उसे दिलोजान से चाहता था, लेकिन हर घड़ी अपनी ही ख़याली दुनिया में खोया हुआ रहने के कारण, वह अपने दिली प्रेम का कोई सुबूत न पेश कर सकता था। हर मर्तबा चाँदरानी अपने पती से उसकी बापर्वाई की शिकायत करती, और हर मर्तबा सूरजराथ मुस्करा कर टाल देता। लेकिन ये सिलसिला ज़ियादा देर तक कायम न रह सका। आखिर चाँदरानी की सालग्रह के दिन जबकि तमाम मेहमान सूरजनाथ के घर आये हुवे थे, सूरजनाथ शहर के एक अदबी ज़लसे की दिलचस्पियों का मरकज बना हुआ था। इस घटना ने चाँदरानी के दिलपर बहुत बुरा असर किया, और बिना सोचे समझे गुस्से की हालत में वह घबराकर ताराचंद के साथ चली गई।
चाँदरानी ताराचंद के साथ बंम्बई आई। किसी चीज की अच्छाई बुराई नज़दीक से ही परखी जाती है। चाँदरानी ने जब ताराचंद को नज़दीक से देखा, तो मालूम हुआ कि वह इन्सान के लिबास में शैतान है, उसे उसने पहचानने में बड़ा ज़बरदस्त धोका खाया. वह इस भेड़िये से बचाना चाहती थी, लेकिन वह मजबूर थी। इत्तेफ़ाक की बात जबकि वह अपनी इन परेशानीयों में मुब्तिला थी, सूरजनाथ के गीतों की एक नई किताब उसके हात लगी, जो उसी के नाम भेंट की गई थी। किताब देख कर उसकी आँखों के सामने से वह सारे पर्दे हट गये जो उसकी कमज़ोर समझ और ताराचंद की चालबाज़ियों ने डोले थे। उसे खुशी से ज़ियादा दुख इस बात का हुआ कि उसने अपने पती को ग़लत समझा। उसने उसी समय फ़ैसला किया कि वह अपनी भूल को ठीक करेगी, चाहे उसे कितनी ही मुसीबतों का समना क्यों न करना पड़े।
मगर क्या चाँदरानी के मन की ये आशा पूरी हुवी? क्या उसके पती ने उसको स्वीकार किया? और फिर बड़ी बात तो ये कि क्या चाँदरानी की इस भूल को समाज ने माफ़ कर दिया? उस समाज ने जिसके माथे पर अयसे लोखों बेगुनाहों के खून का तिलक लगा हुआ हैं। आपको इन तमाम बातों का जवाब "मंझधार" देगी।
[From the official press booklet]